जनजातियां और हिन्दू धर्म
"अलगाववाद के इन नायकों का तर्क है कि ये 'आदिवासी' पेड़, पत्थरों और नागों जैसी चीजों की पूजा करते हैं। इसलिए वे 'एनिमिस्ट' हैं और उन्हें 'हिंदू' नहीं कहा जा सकता। ये एक अज्ञानी व्यक्ति का ही तर्क हो सकता है जिसे हिंदू धर्म की कोई समझ नहीं है । भारत में आज भी सभी लोग पेड़, तुलसी, बिल्व, नाग,गाय सूरज,पृथ्वी की पूजा करते हैं तो क्या हमें इन सभी भक्तों और उपासकों को 'एनिमिस्ट' कह देना चाहिए और उन्हें गैर-हिंदू घोषित कर देना चाहिए?” माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर पिछले वर्ष भारत सरकार ने आज़ादी की लड़ाई में विभिन्न जन जातियों के योगदान को याद करने के लिए बिरसा मुंडा की जयंती पर हर साल १५ नवंबर को मनाये जाने वाले दिवस को "जनजातीय गौरव दिवस" घोषित किया है। उनके इस वीरतापूर्वक संघर्ष को मान्यता देने में देश की सरकारों ने ७५ वर्ष लगा दिये । चलिए देर से ही सही, आखिर जन जातियों के योगदान को हमारी सरकार व हमने स्वीकार तो किया । जनजातियों को समाज के मुख्यधारा से विभाजित करना, उनसे संबंधित तरह तरह की भ्रांतियों को जन्म देना, और उनका विकास नहीं होने देन...